

वाराणसी, 25.09.2026। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत कला भवन में 21वें राय कृष्णदास स्मृति व्याख्यान एवं प्रागैतिहासिक वीथिका का उद्घाटन समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने भारत कला भवन की नवीन प्रागैतिहासिक वीथिका का लोकार्पण कर किया। इस अवसर पर प्रो. श्रीरूप रायचौधरी, निदेशक, भारत कला भवन ने कुलपति को प्रदर्शित कलाकृतियों के बारे में जानकारी दी।
कुलपति जी ने कहा कि भारत कला भवन विश्वविद्यालय का एक ऐसा महत्वपूर्ण केन्द्र है तो समृद्ध विरासत और धरोहर को संजोए हुए है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की व्यापकता, विविधता और ज्ञान परंपरा ऐसे आयोजनों में भी दिखाई देती है। भारत कला भवन में संरक्षित विरासत को समझना, उसका संरक्षण करना और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना महत्वपूर्ण दायित्व है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय परिवार की ओर से भारत कला भवन से संबंधित कार्यों में आवश्यक सुधार एवं संवर्धन के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे। उन्होंने यह भी बताया कि आगामी प्रतिष्ठित सांस्कृतिक आयोजन में भारत कला भवन की महत्वपूर्ण भूमिका होगी और काशी की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक स्तर पर प्रस्तुत किया जाएगा।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. बिंदा दत्तात्रेय परांजपे ने भारत कला भवन से अपने लंबे जुड़ाव और यहाँ की समृद्ध कला एवं सांस्कृतिक परंपरा का उल्लेख किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति और परंपरा को समझने के लिए भारत कला भवन जैसे संस्थानों में संरक्षित कला एवं पुरातात्त्विक सामग्री के अध्ययन के महत्व को बताया। उन्होंने भारत कला भवन में अपने अनुभवों को साझा करते हुए यहाँ के संग्रह, शैक्षणिक गतिविधियों तथा विद्यार्थियों एवं देश-विदेश से आने वाले अतिथियों के साथ अपने जुड़ाव का उल्लेख किया। उन्होंने पाठ्यक्रम को केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित न रखते हुए छात्रों की व्यावहारिक समझ और कौशल विकास से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि छात्रों को अपने अध्ययन की समझ के आधार पर स्वतंत्र कार्य और आंतरिक मूल्यांकन के अवसर दिए जाने चाहिए, ताकि पाठ्यक्रम की वास्तविक समझ विकसित हो। साथ ही, स्किल एन्हांसमेंट के अंतर्गत युवाओं को भारतीय पांडुलिपियों के रखरखाव, संरक्षण और प्रबंधन जैसे व्यावहारिक कौशलों से प्रशिक्षित करने की आवश्यकता बताई, जिससे देश की समृद्ध पांडुलिपि विरासत के संरक्षण में नई पीढ़ी की भूमिका सुनिश्चित हो सके।
मुख्य वक्ता प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार ने “कलचुरी कालीन शैव मूर्ति शिल्प: रूप, शिल्प एवं कलात्मक उत्कर्ष” विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कलचुरी कालीन कला एवं मूर्तिकला की विविधता को विभिन्न प्रतिमाओं के उदाहरणों के माध्यम से समझाया। उन्होंने शैव मूर्तिकला में शिव के विभिन्न रूपों, संहार मूर्तियों तथा कण्डकासुर, गडासुर एवं अन्य असुर आख्यानों से संबंधित शिल्पांकनों की जानकारी दी। गडासुर की मूर्ति के माध्यम से उन्होंने एक ही आख्यान को विभिन्न शिल्प रूपों में प्रस्तुत किए जाने की विशेषता समझाई। उन्होंने भैरव, नटराज, उमामहेश्वर तथा शिव-पार्वती से संबंधित प्रतिमाओं के उदाहरण भी प्रस्तुत किए।
उन्होंने शिव परिवार से संबंधित प्रतिमाओं का उल्लेख करते हुए गणेश, वीणाधारी गणेश, शक्ति के साथ गणेश, उमा के साथ महेश तथा कार्तिकेय के विभिन्न रूपों की जानकारी दी। छह मुख वाले कार्तिकेय के स्वरूप तथा मंदिरों के सामने विराजमान नंदी की प्रतिमाओं के पौराणिक संदर्भ को भी उन्होंने समझाया। उन्होंने इन प्रतिमाओं के माध्यम से शिव परिवार से जुड़ी कथाओं के मूर्तिकला रूपांतरण को बताया। साथ ही भेड़ाघाट, जबलपुर की 10वीं शताब्दी की शिव-पार्वती विवाह मूर्ति का उदाहरण देते हुए विवाह प्रसंग की शिल्पात्मक अभिव्यक्ति के बारे में जानकारी दी।
प्रो. अहिरवार ने सतना, दमोह, तेवर सहित विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त प्रतिमाओं के उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने त्रिलोक, जातक एवं तमिल क्षेत्रों की शिल्प परंपराओं का उल्लेख करते हुए बताया कि विभिन्न क्षेत्रों में पौराणिक आख्यानों की प्रस्तुति में अलग-अलग शिल्प पैटर्न एवं रूप दिखाई देते हैं। उन्होंने 10वीं से 12वीं शताब्दी की प्रतिमाओं के माध्यम से उनके विषय, स्वरूप, मुद्राओं एवं शिल्पगत विशेषताओं की जानकारी दी और भारत कला भवन में संरक्षित प्रतिमाओं को तत्कालीन धार्मिक, सांस्कृतिक एवं कलात्मक परंपराओं को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत बताया।
डॉ. अनिल कुमार सिंह, सहायक क्यूरेटर, भारत कला भवन ने राय कृष्णदास के जीवन एवं योगदान का संक्षिप्त परिचय दिया। भारत कला भवन की सहायक क्यूरेटर डॉ. प्रियंका चंद्रा ने कार्यक्रम का संचालन किया।
डॉ. रेशमा खातून द्वारा लिखित पुस्तक “भारत कला भवन, वॉल्यूम-2” का विमोचन कुलपति ने किया। इस अवसर पर भारत कला भवन की ब्रोशर का भी विमोचन किया गया।
इस अवसर पर डॉ. लेनिन रघुवंशी ने उन्हें मानवाधिकार के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवा के लिए मिले तीन अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार ग्वांगजू प्राइज फॉर ह्यूमन राइट्स (रिपब्लिक ऑफ कोरिया), 2010 ह्यूमन राइट्स प्राइज ऑफ द फ्रेंच रिपब्लिक, प्राइज ऑफ द सिटी ऑफ वाइमर, 2018 ह्यूमन राइट्स प्राइज ऑफ द फ्रेंच रिपब्लिक को माननीय कुलपति को समर्पित किए, जो भारत कला भवन, विश्वविद्यालय में संरक्षित रहेंगे।
कार्यक्रम में डॉ. निशांत, उपनिदेशक, भारत कला भवन, भारत कला भवन के अधिकारी, शिक्षक, शोधार्थी एवं अन्य सदस्य उपस्थित रहे।


