
वाराणसी, 25.09.2026- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केन्द्र एवं भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को भारतीय संस्कृति की जय-यात्रा और रामत्व की प्रतिष्ठा (वाल्मीकि, तुलसीदास और कुबेरनाथ राय के साहित्य के विशेष संदर्भ में)” विषय पर द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ हुआ। दो दिन कुल 8 सत्रों में यह संगोष्ठी आयोजित हो रही है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी की अध्यक्षता एवं गणमान्य अथितियों के द्वारा संगोष्ठी का उद्घाटन किया गया। कुलपति महोदय ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में भारतीय संस्कृति की जय यात्रा के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति अनेक समस्याओं के होते हुए भी अपनी परम्परा को निरन्तर बनाये रखी है। भारतीय संस्कृति के मूल में ही राम है। उद्घाटन सत्र का बीज वक्तव्य प्रदान करते हुए प्रो. अम्बिका दत्त शर्मा ने कहा कि रामत्व की प्रतिष्ठा के लिए लोक एवं शास्त्र दोनों की ही अनिवार्यता है। भारतीय संस्कृति की जय-यात्रा और रामत्व की प्रतिष्ठा उपनिषदों से प्रारम्भ होती है, जहाँ सत्य धर्म की बात की गई है। वाल्मीकि रामायण से तुलसीदास के रामचरितमानस तक पहुँचने के लिए महाभारत और अश्वघोष के बुद्धचरित को लेना आवश्यक है। महाभारत और बुद्धचरित से ही प्रेरित होकर गोस्वामी जी ने अपने ग्रन्थ में करूणावतार के रूप में रामजी को प्रतिष्ठित किया है। उसी परम्परा को आगे लेकर कुबेरनाथ राय ने अपने निबन्धों पर रामत्व की प्रतिष्ठा की है। कुबेरनाथ राय ने अपने निबन्ध में कहा है कि राम ही एक मात्र पूर्णावतार हैं। भारतीय परम्परा में अन्य अवतार या तो अमानुषिक अथवा अतिमानुषिक है। राम ही एक मात्र पूर्णतया मनुष्य के रूप में होने से वह पूर्णावतार हैं।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो. परमेन्द्र कुमार वाजपेयी जी ने कहा कि राम भारतीय चेतना का
प्राण तत्व हैं और भारतीय संस्कृति की चेतना भी है।
गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस में राम केवल देवता नहीं बल्कि चरित्रवान पुरुष हैं। द्विदिवसीय इस संगोष्ठी में मुख्य वक्ताओं के साथ-साथ समानान्तर सत्रों में भी देश के विभिन्न संस्थानों से समागत विद्वानों द्वारा विषयों की प्रस्तुति की जायेगी।
अतिथियों का स्वागत प्रो. शरदिन्दु कुमार तिवारी, समन्वयक, भारत अध्ययन केन्द्र ने किया। संगोष्ठी के धन्यवाद ज्ञापन संगोष्ठी संयोजक डॉ. ज्ञानेन्द्र नारायण राय ने किया।