
वाराणसी, 08.10.2026। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के आयुर्वेद संकाय के प्रसूति तंत्र विभाग द्वारा KAGOF के उत्तर प्रदेश चैप्टर एवं KAGOF नेशनल के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन PRASUTICON-2.0 का शुभारंभ गुरुवार को बीएचयू स्थित स्वतंत्रता भवन में हुआ। KAGOF के 7वें वार्षिक सम्मेलन के रूप में आयोजित यह दो दिवसीय सम्मेलन “क्लिनिकल एंड रिसर्च एडवांसमेंट इन वीमेन्स हेल्थ: फ्रॉम टेक्स्ट टू प्रैक्टिस” विषय पर केंद्रित है।
अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने रोगियों को उपचार के विभिन्न विकल्पों के बारे में सही जानकारी के आधार पर निर्णय लेने में सक्षम बनाने के लिए चिकित्सा की विभिन्न प्रणालियों को एक साथ लाने की आवश्यकता बताई। सम्मेलन के विषय का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी मानने के बजाय दोनों की विशिष्ट क्षमताओं और उपयुक्त क्षेत्रों को पहचानने की आवश्यकता है।


कुलपति ने आयुर्वेद एवं आधुनिक चिकित्सा के चिकित्सकों और शोधकर्ताओं के बीच अधिक संवाद की आवश्यकता बताई तथा सुझाव दिया कि बीएचयू विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों के विशेषज्ञों को एक साथ लाने के लिए अन्तरर्विषयी सम्मेलनों के आयोजन में पहल कर सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसी अंतरविषयी पहल के लिए बीएचयू की स्थिति विशिष्ट है, क्योंकि यहां आयुर्वेद संकाय और आधुनिक चिकित्सा संकाय एक ही संस्थान के अंतर्गत कार्य करते हैं।
प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि संस्थान का मुख्य उद्देश्य रोगी को केंद्र में रखते हुए उन्हें और उनके परिवार को विश्वसनीय एवं सुलभ जानकारी उपलब्ध कराना होना चाहिए, ताकि वे स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में उचित निर्णय ले सकें। उन्होंने प्रसूति तंत्र विभाग को सम्मेलन के आयोजन के लिए बधाई दी तथा आशा व्यक्त की कि महिलाओं के स्वास्थ्य से संबंधित आयुर्वेद की विशिष्ट उपचार पद्धतियों को शोध और व्यापक चिकित्सकीय उपयोग के माध्यम से अधिक पहचान मिलेगी।
मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो. सरोज चूरामणि गोपाल, विशिष्ट प्रोफेसर, पीडियाट्रिक सर्जरी, आईएमएस-बीएचयू तथा विशिष्ट विजिटिंग प्रोफेसर, जैविक विज्ञान एवं बायोइंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी कानपुर ने आयुर्वेद के ज्ञान को समकालीन वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय दृष्टिकोणों के साथ जोड़ने की आवश्यकता बताई।उन्होंने महिला स्वास्थ्य के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि परिवार और समाज के पोषण में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका के बावजूद उनके स्वास्थ्य की अक्सर उपेक्षा की गई है। उन्होंने आयुर्वेद की क्षमताओं के वैज्ञानिक प्रमाणीकरण तथा उसके प्रमाण-आधारित उपचारों को व्यापक पहचान दिलाने की आवश्यकता बताई।
प्रो. गोपाल ने आयुर्वेद के विकास के लिए महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की दूरदृष्टि का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों में ज्ञान का विशाल भंडार मौजूद है, जो व्यवस्थित शोध एवं वैज्ञानिक प्रमाणीकरण के माध्यम से समकालीन स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान दे सकता है।
प्रो. एस. एन. संखवार, निदेशक, आईएमएस-बीएचयू ने सम्मेलन के आयोजन के लिए प्रसूति तंत्र विभाग के प्रयासों की सराहना की तथा विभाग के शैक्षणिक एवं चिकित्सकीय योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आईएमएस-बीएचयू में आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेद तथा पारंपरिक चिकित्सा की अन्य मान्य प्रणालियों को साथ लेकर बहुविषयी दृष्टिकोण विकसित करने की व्यापक संभावनाएं हैं।
प्रो. के.एच.एच.वी.एस.एस. नरसिम्हा मूर्ति, संकाय प्रमुख, आयुर्वेद संकाय ने विभाग की दीर्घ शैक्षणिक परंपरा तथा आयुर्वेद शिक्षा के क्षेत्र में उसके विकास का उल्लेख किया। उन्होंने शोध के महत्व को स्पष्ट करते हुए समकालीन वैज्ञानिक दृष्टिकोणों को शास्त्रीय आयुर्वेदिक ज्ञान के साथ जोड़ने की आवश्यकता व्यक्त की।
प्रो. मूर्ति ने सुझाव दिया कि सम्मेलन में हुई चर्चाओं एवं विचार-विमर्श को व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकृत कर प्रकाशनों और व्यावहारिक दिशा-निर्देशों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जिससे भविष्य में शिक्षण एवं पाठ्यक्रम विकास में सहायता मिल सके। उन्होंने विद्यार्थियों से वैज्ञानिक सत्रों में सक्रिय रूप से भाग लेने का आग्रह करते हुए कहा कि अनुभवी शोधकर्ताओं एवं चिकित्सकों के साथ संवाद से उन्हें महत्वपूर्ण जानकारी एवं अनुभव प्राप्त हो सकते हैं, जो उनके शैक्षणिक और व्यावसायिक जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।
डॉ. सुनीता चंद्रा, कुलसचिव, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हायर तिब्बतन स्टडीज, सारनाथ ने भी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों और समकालीन स्वास्थ्य सेवाओं के बीच सहयोग के महत्व को बताया ।आयुर्वेद और सोवा-रिग्पा के बीच संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक शोध पारंपरिक ज्ञान को विभिन्न प्रणालियों के बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय उसकी जांच और मजबूती में सहायक हो सकते हैं। उन्होंने शोध को पारंपरिक ग्रंथों में संरक्षित ज्ञान और उसके चिकित्सकीय उपयोग के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बताया।
प्रो. नलिनाक्षन ए., संरक्षक, KAGOF ने संगठन की यात्रा का उल्लेख करते हुए मुंबई में आयोजित पहले वार्षिक सम्मेलन से लेकर बीएचयू में आयोजित हो रहे सातवें संस्करण तक की प्रगति को रेखांकित किया। उन्होंने देशभर में आयुर्वेद चिकित्सकों की बढ़ती भागीदारी का उल्लेख किया तथा PRASUTICON-2.0 की सफलता के लिए शुभकामनाएं दीं।
स्वागत संबोधन में प्रो. दीपा मिश्रा, विभागाध्यक्ष, प्रसूति तंत्र विभाग एवं आयोजन अध्यक्ष ने सम्मेलन के विषय पर कहा कि शास्त्रीय ज्ञान को वैज्ञानिक प्रमाण, चिकित्सकीय उपयोग और बेहतर स्वास्थ्य परिणामों से जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन KAGOF के सातवें वार्षिक आयोजन के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित होते रहे इसके शैक्षणिक क्रम को आगे बढ़ाता है।
सम्मेलन की आयोजन उपाध्यक्ष एवं प्रसूति तंत्र विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. सुनीता सुमन ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि सम्मेलन में 560 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए हैं, जिनमें प्री-कॉन्फ्रेंस कार्यशाला के 210 प्रतिभागी भी शामिल हैं। सम्मेलन में 27 रिसोर्स पर्सन और 26 मुख्य वक्ता भी भाग ले रहे हैं। वैज्ञानिक कार्यक्रम में 208 शोध-पत्र प्रस्तुतियां, लगभग 70 पोस्टर, सात पूर्ण सत्र, 24 वैज्ञानिक सत्र और तीन विशेष पोस्टर सत्र शामिल हैं।
उद्घाटन सत्र में सम्मेलन की स्मारिका का विमोचन भी किया गया। सत्र का समापन डॉ. शिखा तिवारी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
प्री-कॉन्फ्रेंस कार्यशाला का आयोजन 7 अक्टूबर को आईएमएस-बीएचयू के के.एन. उडुपा हॉल में किया गया। इसमें लैप्रोस्कोपिक-असिस्टेड हिस्टेरेक्टॉमी और नॉन-डिसेंट वैजाइनल हिस्टेरेक्टॉमी का प्रदर्शन किया गया। इसके साथ ही विद्धकर्म-अग्निकर्म और मर्म चिकित्सा पर केंद्रित सत्र भी आयोजित किए गए।
यह सम्मेलन शोधकर्ताओं, चिकित्सकों, संकाय सदस्यों, स्नातकोत्तर शोधार्थियों और विद्यार्थियों को महिला स्वास्थ्य के क्षेत्र में समकालीन विकास पर विचार-विमर्श करने तथा शास्त्रीय आयुर्वेदिक ज्ञान को प्रमाण-आधारित चिकित्सकीय उपयोग से जोड़ने के तरीकों पर विचार करने के लिए मंच प्रदान कर रहा है।