वाराणसी,07.08.2026

भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर), पुणे द्वारा अपनी iRISE (इंस्पायरिंग इंडिया इन रिसर्च इनोवेशन एंड STEM एजुकेशन) पहल के अंतर्गत, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विज्ञान संस्थान के सहयोग से प्रारंभिक कैरियर शोधार्थियों के लिए तीन दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यशाला (लेवल-I) का उद्घाटन सीडीसी भवन में हुआ। 7 से 9 अगस्त तक आयोजित यह कार्यशाला युवा शोधार्थियों के व्यावसायिक एवं हस्तांतरणीय कौशलों को सुदृढ़ करने तथा उन्हें अकादमिक, उद्योग, नवाचार एवं विज्ञान शिक्षा के क्षेत्र में प्रासंगिक दक्षताओं से सुसज्जित करने के उद्देश्य से आयोजित की जा रही है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने पीएच.डी. की यात्रा को चुनौतीपूर्ण, किंतु अत्यंत संतोषजनक बताया। अपने शोध अनुभव साझा करते हुए उन्होंने शोधार्थियों को कठिनाइयों के बीच धैर्य बनाए रखने के लिए प्रेरित किया और कहा कि महान उपलब्धियां निरंतर प्रयास एवं दृढ़ता से ही प्राप्त होती हैं। उन्होंने प्रतिभागियों को सलाह दी कि वे शोध की सफलता को केवल प्रकाशनों या उद्धरणों की संख्या से न आंकें, बल्कि सार्थक ज्ञान के अनुसंधान के प्रति प्रतिबद्ध रहें। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि गुणवत्तापूर्ण शोध को समय के साथ स्वतः मान्यता मिलती है। iRISE कार्यक्रम के उद्देश्यों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि यह पहल शोध नैतिकता के साथ-साथ नवाचार, उद्यमिता, शिक्षण एवं उद्योग उन्मुखता को भी बढ़ावा देती है, जिससे प्रारंभिक कैरियर शोधार्थियों को प्रभावशाली शैक्षणिक एवं व्यावसायिक जीवन के लिए आवश्यक दक्षताएं प्राप्त होती हैं।
प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के संयोजक प्रो. सत्येन साहा ने शोध नैतिकता को प्रोत्साहित करने तथा क्षमता निर्माण पहलों के माध्यम से सुदृढ़ शोध पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने शोध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग का उल्लेख करते हुए इसके अंधाधुंध प्रयोग के प्रति सावधानी बरतने की सलाह दी तथा कहा कि अत्यधिक निर्भरता शोधार्थियों की विश्लेषणात्मक एवं आलोचनात्मक सोच को प्रभावित कर सकती है।
उद्घाटन व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए आईआईएसईआर, पुणे के iRISE प्रोजेक्ट से जुड़ी संसाधन विशेषज्ञ सुश्री वैश्नवी कुलकर्णी ने प्रभावी शोध पद्धतियों, शोध के उत्तरदायी आचरण तथा प्रारंभिक कैरियर शोधार्थियों में व्यावसायिक क्षमता निर्माण के महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसे डॉ. संदीप द्वारा प्रस्तुत किया गया, जबकि कार्यक्रम का संचालन डॉ. अर्चना तिवारी ने किया। इस अवसर पर विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. संजय कुमार तथा विज्ञान संकाय प्रमुख प्रो. अरुण देव सिंह भी उपस्थित रहे।
कार्यशाला में विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा सत्र आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें सुश्री अनीता नागराजन द्वारा वैज्ञानिक संचार, डॉ. मिलिंद चौधरी द्वारा नवाचार एवं उद्यमिता, डॉ. मनवा दिवेकर द्वारा विज्ञान शिक्षाशास्त्र, शिक्षार्थी-केंद्रित शिक्षण पद्धतियां एवं विज्ञान में वैकल्पिक करियर, तथा प्रो. नागराज बालासुब्रमणियन द्वारा अकादमिक करियर पर व्याख्यान शामिल हैं।
तीन दिनों की इस कार्यशाला के दौरान प्रतिभागी चार प्रमुख विषयों: प्रभावी वैज्ञानिक संचार, नवाचार एवं उद्यमिता, विज्ञान शिक्षा में नवीन शिक्षण पद्धतियां तथा विज्ञान में विविध करियर अवसर पर आधारित सत्रों में भाग लेंगे। इन सत्रों का उद्देश्य प्रतिभागियों को उनके शोध क्षेत्र से परे व्यावहारिक कौशल एवं दृष्टिकोण प्रदान करना है, जिससे वे विभिन्न व्यावसायिक मार्गों में सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकें।
