
माननीय मुख्यमंत्री महोदय,
आपके संज्ञान में एक अत्यंत गंभीर एवं लोकतांत्रिक मूल्यों को आहत करने वाला विषय प्रस्तुत है। यह विषय केवल अधिवक्ताओं के हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान, न्याय व्यवस्था तथा नागरिक अधिकारों की रक्षा से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है।
विगत वर्ष दिनांक 31.05.2025 को सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ के अध्यक्ष श्री अखिलेश जायसवाल द्वारा इन्फ्रास्ट्रक्चर उपसमिति/विशेष न्यायाधीश, POCSO कोर्ट संख्या-03, जनपद न्यायालय, लखनऊ को एक विस्तृत पत्र (छायाप्रति संलग्न) प्रेषित किया गया था जिसमें पुराने उच्च न्यायालय भवन, उसके आसपास की खाली भूमि, जनपद न्यायालय परिसर की अव्यवस्थाओं, पार्किंग संकट, यातायात जाम तथा न्यायालयों के स्थानांतरण से संबंधित अनेक व्यावहारिक एवं दूरदर्शी सुझाव दिए गए थे। उक्त पत्र की प्रतियां महामहिम राष्ट्रपति, माननीय प्रधानमंत्री, महामहिम राज्यपाल तथा उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों सहित अनेक संवैधानिक पदाधिकारियों को भी प्रेषित की गई थी। पत्र की प्रति आपको भी पृष्ठांकित की गई थी।
स्पष्ट है कि इन सुझावों का उद्देश्य न्यायालय परिसर में अधिवक्ताओं, वादकारियों तथा आम नागरिकों को राहत प्रदान करना था। दुर्भाग्यवश इन सुझावों पर कोई गंभीर विचार नहीं किया गया। इसके विपरीत, उच्च न्यायालय के आदेशों की आड़ में दिनांक 17.05.2026 को भारी पुलिस बल एवं नगर निगम प्रशासन के माध्यम से अधिवक्ताओं के चेम्बरों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें ध्वस्त कर दिया गया। वहाँ पर रामचरित मानस का पाठ कर रहे पंडित जी के साथ मार-पीट की गयी, पवित्र रामचरित मानस की पुस्तक को फेंक दिया गया। शांतिपूर्ण विरोध कर रहे अधिवक्ताओं पर लाठीचार्ज किया गया, जिसमें अनेक अधिवक्ता गंभीर रूप से घायल हुए तथा उन्हें अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा। समाचार पत्रों एवं प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार अधिवक्ताओं को अपमानजनक व्यवहार, बलप्रयोग तथा दमनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ा। यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक है कि जो अधिवक्ता संविधान एवं नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालयों में संघर्ष करते हैं, वही आज स्वयं असुरक्षा एवं अन्याय का शिकार हो गए हैं।
यह भी अत्यंत दुःखद है कि अधिवक्ताओं के लिए किसी प्रकार की सम्मानजनक वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराई गई। परिणामस्वरूप न्यायिक कार्य प्रभावित हो गया है, मुकदमों की सुनवाई बाधित है तथा आम जनता को न्याय प्राप्ति में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। अधिवक्ताओं में व्यापक आक्रोश एवं असंतोष व्याप्त है।
आज स्थिति यह हो गई है कि किसी भी अधिवक्ता को न तो सुरक्षित कार्यस्थल उपलब्ध है, न पार्किंग की सुविधा, न ही सम्मानपूर्वक अपने पेशे का निर्वहन करने का वातावरण। लंबे समय से अधिवक्ता संरक्षण कानून (Advocates Protection Bill) की मांग भी केंद्र सरकार के समक्ष लंबित पड़ी है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत चिंताजनक है।