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बीएचयू में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा एवं पं. दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन’ पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ

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वाराणसी, 10.08.2026। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में “भारतीय ज्ञान परंपरा एवं पं. दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन : वैश्विक परिप्रेक्ष्य एवं समकालीन प्रासंगिकता” विषयक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन सोमवार को संबोधि सभागार में किया गया। सम्मेलन का आयोजन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पं. दीनदयाल उपाध्याय पीठ द्वारा विश्वविद्यालय के प्रायोजित अनुसंधान एवं औद्योगिक परामर्श प्रकोष्ठ (SRICC) के सहयोग से हुआ। सम्मेलन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा की विविधता, समृद्धि एवं समकालीन प्रासंगिकता तथा पं. दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन के विभिन्न आयामों पर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अकादमिक विमर्श को बढ़ावा देना है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की मौलिकता एवं उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने अकादमिक सम्मेलनों में विषयों को केंद्रित रखने तथा प्रतिभागियों के बीच विषय की गहन समझ विकसित करने के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले शोध-पत्रों के शीर्षक के साथ संक्षिप्त सारांश उपलब्ध कराने का सुझाव दिया।
प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि किसी भी अकादमिक कार्यक्रम की सफलता का आकलन केवल उसके आयोजन की भव्यता से नहीं, बल्कि इस बात से किया जाना चाहिए कि उससे विश्वविद्यालय, प्रतिभागियों और श्रोताओं को क्या प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय जैसे चिंतकों के विचारों को समझने और उन्हें समकालीन संदर्भ में सार्थक रूप से आगे बढ़ाने के लिए भारत की ऐतिहासिक एवं सामाजिक वास्तविकताओं को समझना आवश्यक है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो. आर. एस. दुबे, कुलाधिपति, राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान (NIEPA), नई दिल्ली ने अपने उद्घाटन संबोधन में भारतीय दार्शनिक चिंतन में व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और प्रकृति के पारस्परिक संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने कर्तव्यों, नैतिकता और सदाचरण के मार्गदर्शन में ‘धर्म’ की केंद्रीय भूमिका पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया कि धर्म का आशय केवल धार्मिक आस्था से नहीं, बल्कि सदाचरण एवं अपने कर्तव्यों के निर्वहन से है। उन्होंने कहा कि अर्थ और काम का संचालन धर्म के मार्गदर्शन में होना चाहिए। प्रो. दुबे ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, पर्यावरणीय सामंजस्य एवं सार्वभौमिक कल्याण जैसे भारतीय सिद्धांतों को वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के समाधान की दृष्टि से विशेष रूप से प्रासंगिक बताया।
मुख्य वक्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा बौद्धिक बहुलता, आलोचनात्मक चिंतन और अकादमिक उत्कृष्टता पर आधारित विविधतापूर्ण सभ्यतागत ज्ञान परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल वैदिक परंपरा तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें बौद्ध, जैन, सिख, तमिल, जनजातीय, मौखिक, लोक एवं विभिन्न क्षेत्रीय ज्ञान परंपराएं भी शामिल हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणालियां पश्चिम-विरोधी नहीं हैं, बल्कि बौद्धिक एकाधिकार का विरोध करती हैं। उन्होंने भारतीय चिंतकों को वैश्विक अकादमिक विमर्श में उचित स्थान दिए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए पाणिनि को चॉम्स्की, कौटिल्य को मैकियावेली, आर्यभट्ट को न्यूटन तथा अभिनवगुप्त को अरस्तू के साथ वैश्विक ज्ञान परंपरा के संदर्भ में देखने की बात कही। उन्होंने संस्कृत सहित भारतीय भाषाओं को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर भी बल दिया। साथ ही, उन्होंने सुझाव दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को पढ़ने, लिखने, चिंतन करने और प्रश्न पूछने जैसी मानवीय क्षमताओं का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री मिथिलेशनंदिनी शरण जी महाराज ने कहा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय पहले दार्शनिक और उसके बाद राजनीतिक चिंतक थे। उन्होंने एकात्म मानववाद की दार्शनिक आधारभूमि पर प्रकाश डालते हुए व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्ठि की अवधारणाओं के माध्यम से पं. दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन को समझने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा एक जीवंत परंपरा है, जो भारत की सांस्कृतिक प्रथाओं और समुदायों में निहित है। उन्होंने विकास को प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण बनाए रखने पर बल देते हुए कहा कि पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण केवल पुस्तकों और संगोष्ठियों के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
कार्यक्रम में पं. दीनदयाल उपाध्याय पीठ के समन्वयक प्रो. तेज प्रताप सिंह ने स्वागत संबोधन दिया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रिया खुरादी ने किया। इस तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विश्व के विभिन्न देशों से आए विद्वानों ने भारतीय ज्ञान परंपरा और पं. दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन की समकालीन प्रासंगिकता सहित विभिन्न आयामों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

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