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भरहुत की कला भारतीय समाज, संस्कृति और जीवन-दृष्टि का जीवंत दस्तावेज : प्रो. मारुति नन्दन प्रसाद तिवारी

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भारत अध्ययन केन्द्र में ‘Masterpieces of Bharhut’ का लोकार्पण एवं पुस्तक परिचर्चा आयोजित

वाराणसी, 4 नवम्बर। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केन्द्र में बुधवार को ‘भारत अध्ययन साहित्य संवाद’ के अंतर्गत डॉ. सुद्युम्न आचार्य द्वारा लिखित पुस्तक ‘Masterpieces of Bharhut’ का लोकार्पण एवं पुस्तक परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में भारत कला भवन के निदेशक प्रो. श्रीरूप राय चौधरी उपस्थित रहे। मुख्य वक्ता के रूप में कला इतिहास के प्रख्यात विद्वान एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. मारुति नन्दन प्रसाद तिवारी ने अपने विचार व्यक्त किए। पुस्तक के लेखक डॉ. सुद्युम्न आचार्य ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया।

पुस्तक में भरहुत की प्राचीन मूर्तिकला, उसकी कलात्मक विशिष्टताओं तथा दुर्लभ कलाकृतियों को छायाचित्रों और प्रतिकृतियों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इसमें विशेष रूप से उन कलाकृतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जो आज विभिन्न संग्रहालयों में संरक्षित हैं और अपने मूल ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिवेश से दूर हो चुकी हैं।

लेखक डॉ. सुद्युम्न आचार्य ने पुस्तक की विषयवस्तु पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भरहुत की अनेक कलाकृतियों की प्रतिकृतियाँ सतना स्थित भरहुत कला संग्रहालय में संरक्षित हैं। पुस्तक में रामवन संग्रहालय, सतना में सुरक्षित एक दुर्लभ कलाकृति को विशेष स्थान दिया गया है। उन्होंने प्राचीन मूर्तियों के मूल स्वरूप, उनके कलात्मक सौंदर्य और ऐतिहासिक महत्त्व को छायाचित्रों एवं विवरणों के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया है। पुस्तक में एक ऐसी दुर्लभ प्रतिमा का भी उल्लेख है, जिसे उसके मूल ऐतिहासिक महत्त्व के अनुरूप संरक्षित न किए जाने के बजाय बाद में धार्मिक स्वरूप प्रदान कर दिया गया। इस प्रसंग के माध्यम से लेखक ने ऐतिहासिक कलाकृतियों के संरक्षण की आवश्यकता की ओर ध्यान आकर्षित किया।

मुख्य वक्ता प्रो. मारुति नन्दन प्रसाद तिवारी ने भरहुत की मूर्तिकला के सौंदर्य, बौद्ध धर्म की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति और भारतीय कला-दृष्टि पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने लगभग दो हजार वर्ष पुरानी लक्ष्मी की एक अत्यंत सुंदर प्रतिमा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसकी कलात्मक अभिव्यक्ति अद्भुत है। प्रतिमा में कमल पर विराजमान देवी लक्ष्मी का श्वेत ऐरावत हाथियों द्वारा कमल कलश से अभिषेक किया जा रहा है। यह प्रतिमा भारतीय कला में देवी लक्ष्मी के स्वरूप और उपासना की प्राचीन परंपरा का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।

उन्होंने कहा कि भरहुत स्तूप को केवल बौद्ध स्थापत्य अथवा धार्मिक कला के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह तत्कालीन भारतीय समाज, संस्कृति और जीवन-दृष्टि को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी स्मृति और उपासना की अभिव्यक्ति स्तूप, बोधिवृक्ष, चरणचिह्न और धर्मचक्र जैसे प्रतीकों के माध्यम से हुई। भरहुत स्तूप के तोरणों, वेदिकाओं और प्रदक्षिणा पथ पर इन प्रतीकों का अंकन तत्कालीन धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक जीवन की जानकारी देता है।

दशरथ जातक के चित्रांकन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भरहुत स्तूप पर इसका अंकन भारतीय कला और जातक साहित्य के इतिहास की दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है। भरहुत की कलाकृतियों में अनेक ऐसी कथाएँ और प्रसंग मिलते हैं, जो तत्कालीन सामाजिक जीवन, लोकविश्वासों और सांस्कृतिक अंतर्संबंधों को समझने में सहायता करते हैं।

कला और समाज के संबंधों पर विचार व्यक्त करते हुए प्रो. तिवारी ने कहा कि कला को केवल सौंदर्य, मनोरंजन अथवा भौतिक आकर्षण तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। किसी भी कालखंड के समाज, उसकी जीवनशैली, विचारों और मान्यताओं को समझने के लिए उस काल की कला का अध्ययन आवश्यक है। शास्त्र जहाँ किसी समाज के विचारों और सिद्धांतों की सैद्धांतिक अभिव्यक्ति करते हैं, वहीं कला उनकी व्यावहारिक और दृश्य अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि भरहुत की कलाकृतियों में केवल राजाओं और शासकों का इतिहास नहीं, बल्कि सामान्य जनजीवन के विविध पक्ष भी दिखाई देते हैं। इनमें मनुष्य का उल्लास, शृंगार, प्रेम, कर्म और जीवन के अनेक रूप अभिव्यक्त हुए हैं। इस दृष्टि से भरहुत की कला तत्कालीन सामाजिक इतिहास का जीवंत दस्तावेज है।

उन्होंने भारत अध्ययन केन्द्र द्वारा भरहुत की कलाकृतियों की प्रतिकृतियों, छायाचित्रों, अभिलेखों तथा उनके विश्लेषण और अनुवाद को एक स्थान पर उपलब्ध कराने के प्रयास की विशेष सराहना की। उन्होंने कहा कि भरहुत की मूल कलाकृतियाँ देश के विभिन्न संग्रहालयों में बिखरी हुई हैं। ऐसे में उनके प्रतिरूपों और छायाचित्रों के माध्यम से एक स्थान पर उन्हें प्रस्तुत करना शोधार्थियों, विद्यार्थियों और सामान्य जिज्ञासुओं के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। उन्होंने लेखक डॉ. सुद्युम्न आचार्य की विद्वत्ता, सक्रियता और बौद्धिक सजगता की प्रशंसा करते हुए उनके निरंतर शोध एवं लेखन की कामना की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने पुस्तक लोकार्पण समारोह को अकादमिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बताया और कहा कि ऐसी कृतियाँ हमारी संस्कृति को समझने का मुख्य आधार बनेंगी। मुख्य अतिथि प्रो. श्रीरूप राय चौधरी ने कहा कि भारतीय कला ,विरासत तथा बुद्ध कालीन पुरातात्त्विक संदर्भों को समझने में यह पुस्तक बेहद सहयोगी होगी। विद्वानों ने भरहुत की कला-संपदा के अध्ययन, संरक्षण और उसके व्यापक अकादमिक प्रसार की प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

कार्यक्रम में भारतीय कला, पुरातत्त्व, इतिहास और संस्कृति के अध्येताओं, शिक्षकों एवं शोधार्थियों की सहभागिता रही। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. अमित कुमार पाण्डेय ने किया तथा स्वागत केन्द्र के समन्वयक प्रो. शरदिंदु कुमार तिवारी ने किया।

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