
वाराणसी, 25.08.2026। भारतीय ज्ञान-परंपरा केवल ज्ञान के सृजन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसके संरक्षण, संवर्धन और अगली पीढ़ियों तक हस्तांतरण की भी एक समृद्ध परंपरा रही है। खुदाबख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी इस दुर्लभ परंपरा का जीवंत उदाहरण है। यह बात पटना के विद्वान डॉ. जाकिर हुसैन ने कही।
भारत अध्ययन केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त आयोजन में चल रही पन्द्रह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला “भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ” में अपने व्याख्यान के दौरान डॉ. हुसैन ने खुदाबख्श लाइब्रेरी के इतिहास, उसके दुर्लभ संग्रह और भारतीय ज्ञान-संपदा के संरक्षण में उसकी भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान की यात्रा मौखिक परंपरा से शुरू होकर शिलालेखों, भोजपत्र, चमड़े, कपड़े और कागज से होते हुए आज डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक पहुँची है। ज्ञान के माध्यम बदलते रहे, लेकिन उसे संरक्षित करने की भारतीय चेतना निरंतर बनी रही। खुदाबख्श लाइब्रेरी इसी चेतना की आधुनिक अभिव्यक्ति है।
डॉ. हुसैन ने बताया कि 1857 के बाद भारतीय समाज में अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को सुरक्षित रखने की आवश्यकता का गहरा बोध पैदा हुआ। इसी दौर में शिक्षा संस्थाओं और पुस्तकालयों की स्थापना का व्यापक अभियान दिखाई देता है। खुदाबख्श लाइब्रेरी भी इसी ज्ञान-जागरण और संरक्षण-चेतना की महत्वपूर्ण कड़ी बनी।
उन्होंने कहा कि खुदाबख्श के संस्थापक मौलवी मोहम्मद बख्श ने दुर्लभ पुस्तकों और पांडुलिपियों का संग्रह आरंभ किया, जिसे उनके पुत्र खुदाबख्श ने अपने जीवन का मिशन बना लिया। उन्होंने देश-विदेश से दुर्लभ पांडुलिपियाँ और प्रकाशित ग्रंथ एकत्र किए। उनके प्रयासों से फारसी, अरबी, उर्दू, संस्कृत, हिंदी, अवधी, तुर्की, पश्तो सहित अनेक भाषाओं की बहुमूल्य सामग्री एक ही स्थान पर संरक्षित हो सकी।
व्याख्यान में लाइब्रेरी की दुर्लभ चित्रित पांडुलिपियों का विशेष उल्लेख किया गया। डॉ. हुसैन ने बताया कि संग्रह में मुगलकालीन मिनिएचर पेंटिंग्स के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। कुछ पांडुलिपियों में चित्र बनाने वाले कलाकार, रंग भरने वाले कलाकार और चित्र का खाका तैयार करने वाले कलाकारों के नाम तक दर्ज हैं। उन्होंने 1834 की एक पेंटिंग का उल्लेख करते हुए कहा कि यह राजा रवि वर्मा के जन्म से भी पहले की है। इससे भारत में विकसित चित्रकला की उस परंपरा पर नए सिरे से विचार करने का अवसर मिलता है, जो रवि वर्मा से पहले ही मौजूद थी।
उन्होंने दारा शिकोह से संबंधित पांडुलिपियों को भी अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। सिर्र-ए-अकबर में उपनिषदों के फारसी अनुवाद के माध्यम से भारतीय आध्यात्मिक चिंतन को फारसी जगत तक पहुँचाने का प्रयास किया गया। इस प्रकार की पांडुलिपियाँ भारतीय और इस्लामी बौद्धिक परंपराओं के बीच संवाद का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।
डॉ. हुसैन ने बताया कि लाइब्रेरी में भगवद्गीता की हिंदी भाषा और फारसी लिपि में लिखी दुर्लभ पांडुलिपि भी उपलब्ध है। संस्कृत में भगवद्गीता, अवधी में रामायण, मलिक मोहम्मद जायसी की पद्मावत, राग-रागिनी, शाहनामा तथा विभिन्न मुगल, फारसी, तुर्की और मंगोल चित्रशैलियों से संबंधित पांडुलिपियाँ इसके संग्रह को विशिष्ट बनाती हैं।
उन्होंने कहा कि इन पांडुलिपियों का महत्व केवल उनकी प्राचीनता में नहीं है। वे भारत के बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक ज्ञान-संसार का प्रमाण हैं। एक ही पुस्तकालय में संस्कृत, हिंदी, अवधी, फारसी और उर्दू की सामग्री का सुरक्षित रहना भारतीय समाज में ज्ञान के निरंतर संवाद और आदान-प्रदान को दर्शाता है।
बनारस के इतिहास के संदर्भ में भी खुदाबख्श लाइब्रेरी के संग्रह को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि बनारस के जमींदारों और क्षेत्रीय इतिहास से संबंधित दुर्लभ पांडुलिपियाँ यहाँ उपलब्ध हैं। इन स्रोतों के आधार पर इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के अनेक पक्षों को समझने का प्रयास किया है। इस दृष्टि से खुदाबख्श लाइब्रेरी इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए केवल पुस्तकालय नहीं, बल्कि प्राथमिक स्रोतों का महत्वपूर्ण भंडार है।
डॉ. हुसैन ने कहा कि लगभग 135 वर्षों की यात्रा में खुदाबख्श लाइब्रेरी देश-विदेश के विद्वानों और बुद्धिजीवियों के आकर्षण का केंद्र रही है। अनेक प्रसिद्ध विद्वानों और राष्ट्रीय हस्तियों ने यहाँ आकर इसके संग्रह का अध्ययन किया और इसकी महत्ता को स्वीकार किया।
उन्होंने कहा कि खुदाबख्श लाइब्रेरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ भारत की विविध ज्ञान-परंपराएँ एक-दूसरे से संवाद करती दिखाई देती हैं। यहाँ ग्रंथ केवल सुरक्षित नहीं हैं, बल्कि वे भारत के बौद्धिक इतिहास, सांस्कृतिक सह-अस्तित्व और ज्ञान-साधना की निरंतरता के साक्षी हैं।
समापन में उन्होंने कहा कि आज ज्ञान का माध्यम कागज से डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक पहुँच गया है, लेकिन ज्ञान-संपदा को सुरक्षित रखकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। खुदाबख्श लाइब्रेरी की परंपरा हमें यही संदेश देती है कि विरासत का संरक्षण केवल अतीत को बचाना नहीं, बल्कि भविष्य की ज्ञान-यात्रा को मजबूत करना है।
फोर्ट विलियम कॉलेज भारतीय भाषाओं के इतिहास और ज्ञान-निर्माण की महत्वपूर्ण प्रयोगशाला : प्रो. प्रभाकर सिंह
फोर्ट विलियम कॉलेज को केवल अंग्रेजी शासन के दौर में भारतीय भाषाओं के अध्ययन और पुस्तक-निर्माण की संस्था के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह भारतीय भाषाओं के इतिहास, अनुवाद, ज्ञान-निर्माण और हिंदी–उर्दू–हिंदुस्तानी के संबंधों को समझने की महत्वपूर्ण प्रयोगशाला भी रहा है। इसके अध्ययन से यह समझने में मदद मिलती है कि देशज भाषायी परंपराओं और औपनिवेशिक ज्ञान-व्यवस्था के बीच किस प्रकार संवाद और अंतर्विरोध विकसित हुए। यह विचार हिन्दी विभाग, वाराणसी के आचार्य प्रो. प्रभाकर सिंह ने व्यक्त किया।
भारत अध्ययन केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त आयोजन में चल रही पन्द्रह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला “भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ” के अंतर्गत “फोर्ट विलियम कॉलेज और भारतीय भाषाओं का देशज संदर्भ” विषय पर व्याख्यान देते हुए प्रो. सिंह ने कहा कि फोर्ट विलियम कॉलेज में भारतीय भाषाओं के अनेक ग्रंथों का संकलन, संपादन, अनुवाद और प्रकाशन हुआ। इससे भारतीय भाषाओं के अध्ययन को एक संस्थागत स्वरूप मिला, लेकिन इन ग्रंथों के पीछे मौजूद देशज साहित्यिक और भाषायी परंपराओं को समझे बिना इस पूरी प्रक्रिया को नहीं समझा जा सकता।
उन्होंने लल्लूलाल और प्रेमसागर का उल्लेख करते हुए कहा कि फोर्ट विलियम कॉलेज से जुड़ी रचनाएँ आधुनिक हिंदी गद्य के निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। लल्लूलाल की रचनाओं के अध्ययन से उस समय के भाषायी प्रयोगों और पूर्ववर्ती भारतीय साहित्यिक परंपराओं के प्रभाव को समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि बाद के इतिहास-लेखन में लल्लूलाल की विभिन्न रचनाओं को अलग-अलग भाषायी श्रेणियों में रखने की प्रक्रिया पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
प्रो. सिंह ने कहा कि हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी के संबंधों को आधुनिक समय की कठोर भाषायी सीमाओं के आधार पर अतीत में देखना उचित नहीं होगा। उस समय भाषायी प्रयोग अधिक लचीला और परस्पर संवादशील था। हिंदुस्तानी को केवल उर्दू का पर्याय मानना भी इस व्यापक भाषायी परिदृश्य को सीमित कर देता है। खड़ी बोली के विकास में संस्कृत, अरबी, फारसी और विभिन्न देशज भाषाओं के शब्दों तथा अभिव्यक्ति-रूपों का योगदान रहा।
उन्होंने कहा कि फोर्ट विलियम कॉलेज में अनुवाद केवल भाषायी रूपांतरण नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से ज्ञान और साहित्य को नए पाठकों और नए संस्थागत संदर्भों तक पहुँचाया गया। इसलिए अनुवाद की प्रक्रिया को भारतीय ज्ञान-परंपरा और औपनिवेशिक ज्ञान-व्यवस्था के बीच संबंधों को समझने के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए।
प्रो. सिंह ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल सहित हिंदी साहित्य के इतिहासकारों के कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि इतिहास-लेखन में भाषा और साहित्य को जिस प्रकार वर्गीकृत किया गया, उसका हमारी वर्तमान भाषायी समझ पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इसलिए हिंदी साहित्य के इतिहास का पुनर्पाठ करते समय यह देखना आवश्यक है कि किन ग्रंथों और भाषायी रूपों को केंद्र में रखा गया तथा किन्हें अलग श्रेणियों में रख दिया गया।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय भाषाओं का इतिहास फोर्ट विलियम कॉलेज से शुरू नहीं होता। कॉलेज ने जिन भाषायी और साहित्यिक सामग्री को व्यवस्थित स्वरूप दिया, उसके पीछे भारत की दीर्घकालीन देशज परंपराएँ थीं। इसलिए फोर्ट विलियम कॉलेज का अध्ययन भारतीय भाषाओं के इतिहास के साथ-साथ उन देशज ज्ञान-स्रोतों को समझने का भी अवसर देता है, जिनके आधार पर आधुनिक भाषायी संरचनाएँ विकसित हुईं।
उन्होंने कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि ज्ञान के निर्माण, संरक्षण और प्रसार का माध्यम भी है। इस दृष्टि से फोर्ट विलियम कॉलेज का अध्ययन भारतीय ज्ञान-परंपरा और औपनिवेशिक ज्ञान-व्यवस्था के बीच हुए संवाद, तनाव और पुनर्संरचना को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।