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‘स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती “त्यागी जी महाराज : तपोमय जीवनचरित”‘ पुस्तक का लोकार्पण

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भारतीय संत परम्परा, लोकसेवा और ज्ञान-साधना पर हुआ गंभीर विमर्श

वाराणसी, 15 जुलाई।

परमहंस आश्रम ब्रह्मानंद सेवा ट्रस्ट (लुक्सा जोहड़ावाले), वृंदावन की ओर से नवभारत निर्माण समिति, वाराणसी के सहयोग से बुधवार को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वैदिक विज्ञान केन्द्र में ‘स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती “त्यागी जी महाराज : तपोमय जीवनचरित”‘ ग्रंथ का गरिमापूर्ण लोका5कहर्पण एवं उस पर सुचिंतित परिचर्चा आयोजित की गई।

कार्यक्रम में संत परम्परा, भारतीय ज्ञान-दृष्टि, लोकसेवा और आध्यात्मिक जीवन-मूल्यों पर गंभीर एवं सारगर्भित विमर्श हुआ।
त्यागीजी महाराज के सरोकार संपन्न जीवन चरित को सभी वक्ताओं ने प्रेरक बताया।

कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। अतिथियों ने मालवीयजी की प्रतिमा एवं स्वामी ब्रह्मानंद जी के चित्र पर माल्यार्पण किया।

इसके उपरांत अतिथियों का स्वागत किया गया तथा पुस्तक का औपचारिक लोकार्पण संपन्न हुआ।

इस अवसर पर त्यागीजी के शिष्य एवं लुक्सा जोहड़ा, ढाणि और वृंदावन आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी श्री केशवानन्द सरस्वतीजी महाराज ने अपने आशीर्वचन में अपने गुरु त्यागी जी महाराज के तप, त्याग, गुरु-निष्ठा, लोकसेवा और भारतीय आध्यात्मिक परम्परा के संरक्षण में उनके अविस्मरणीय योगदान का स्मरण करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति का वास्तविक आधार आचरण, साधना और लोकमंगल की भावना है। उन्होंने कहा कि ऐसे महापुरुषों का जीवन नई पीढ़ी के लिए पथप्रदर्शक है।
त्यागीजी का काशी से आजीवन जुड़ाव रहा। काशी उनमें रमती थी और वे काशी में रमते थे।
उन्होंने इस जीवन चरित के लेखन के लिए सुप्रसिद्ध लेखिका, कवयित्री एवं कथाकार सविता पांडेय के सहयोग, समर्पण और संवेदनशील लेखन की विशेष सराहना की।

मुख्य वक्ता प्रो. (डॉ.) देवब्रत चौबे, प्रख्यात विद्वान, चिंतक तथा पूर्व आचार्य, धर्म एवं दर्शन विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने कहा कि त्यागी जी महाराज का जीवन भारतीय दार्शनिक परम्परा की सजीव अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार यह पुस्तक केवल एक संत-जीवन का वृत्तांत नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।

प्रो. ज्ञानप्रकाश मिश्र, विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने कहा कि ऐसी कृतियाँ भारतीय ज्ञान-परम्परा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम हैं। प्रो मिश्र ने कहा कि संत का सान्निध्य स्वयं में एक बड़ी कृपा और अनुभूति है।

वरिष्ठ विद्वान श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य अर्चक डॉ श्रीकांत मिश्र ने कृति को सराहते हुए कहा कि त्याग के बिना श्री की कल्पना भी नहीं कर सकते। नवभारत निर्माण समिति के सचिव बृजेश सिंह ने त्यागीजी महाराज के शैक्षिक, सामाजिक एवं मानवीय योगदान का उल्लेख करते हुए उन्हें लोकमंगल के लिए समर्पित महान संन्यासी बताया। पुस्तक की लेखिका सविता पांडेय ने कहा कि इतिहास साक्षी है कि सभ्यताओं के विकास और जल की उपलब्धता का गहरा संबंध रहा है।
त्यागी जी महाराज ने लुक्सा में केवल जोहड़ नहीं बनवाए, बल्कि जल, शिक्षा, सेवा और आत्मविश्वास के माध्यम से एक नई सामाजिक चेतना का निर्माण किया। उन्होंने कहा कि यह कृति किसी चमत्कार की कथा नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘ज्योतिमान इंसान’ की जीवनगाथा है जिसने अपने श्रम, करुणा और सेवा से एक पूरे क्षेत्र के जीवन को बदल दिया।

कार्यक्रम में वरिष्ठ लेखक एवं संस्कृतिकर्मी प्रमोद कुमार पांडेय ने पुस्तक की संकल्पना, निर्माण-प्रक्रिया तथा प्रकाशन-यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह कृति आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ सिद्ध होगी।
गांधी के प्रसिद्ध अध्येता विमल कुमार तिवारी ने स्वामी ब्रह्मानंद के शैक्षिक योगदानों को मालवीयजी की कड़ी बताया।

कार्यक्रम का प्रभावी संचालन वरिष्ठ लेखक एवं बुद्धिधर्मी हर्षवर्द्धन राय ने किया। स्वागत एवं आभार प्रकाश कार्यक्रम संयोजक कृष्ण कुमार पारीक ने किया। श्री पारीक ने त्यागीजी महाराज के जीवन चरित के निमित्त बनने को बाबा विश्वनाथ की कृपा बताया।
उन्होंने सभी अतिथियों, विद्वानों, प्रतिभागियों, मीडिया प्रतिनिधियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। सुनील पारीक, ईशान मिश्र, माया पारीक, मानसी छाबड़ा, मधु, विष्णु शर्मा, हेमंत, हर्षवर्द्धन, उपेंद्र की ओर सक्रिय भागीदारी रही।इस अवसर पर अनेक बुद्धिधर्मी, साहित्यकार, अध्यात्म-चिंतक, प्रबुद्ध नागरिक एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।
“हिन्दू धर्म मानव जीवन के किसी पक्ष को नहीं छोड़ता” — देवब्रत चौबे
“राजा और ऋषि को एक साथ चलना चाहिए। राजा को ऋषि गुण संपन्न होना चाहिए ।” – प्रो चौबे
“मेरे गुरुदेव त्यागी जी महाराज का जीवन-कर्म अध्यात्म की सामाजिकता का अनुपम उदाहरण था। एक निर्जन, असुविधाजनक और वीरान इलाके में उन्होंने स्कूल, कॉलेज की परिकल्पना की एवं अपने तप से साकार किया।”– स्वामी श्री केशवानंद सरस्वती जी महाराज

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