
मुख्य अतिथि पुरी शंकराचार्य पीठ के अस्सी स्थित दक्षिणामूर्ति मठ के स्वामी वनारण्य सरस्वती महाराज ने कहा की आचार्य परशुराम चतुर्वेदी भारतीय संतों की संचार परंपरा के संवाहक थे उन्होंने समाज को संस्का, संस्कृति और परंपरा से जोड़ने का कार्य किया, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी की पुस्तक उत्तर भारत की संत परंपरा का अध्ययन प्रत्येक हिंदू को अवश्य करना चाहिए. नागरी प्रचारिणी सभा काशी के व्योमेश शुक्ल ने कहा कि आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के ऊपर काशी की विशेष छाप थी. उनका काशी के प्रति लगाव उनके साहित्य में परिलक्षित होता है. विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर विद्योत्तमा मिश्र ने कहा कि भारतीय संतो की गौरवशाली विचार दृष्टि बड़ी ही समृद्धि थी. प्रोफेसर देवव्रत चौबे के अनुसार प्रोफेसर परशुराम चतुर्वेदी अधिवक्ता के रूप में कार्य करते थे किंतु वे कबीर, नानक मीराबाई एवं रविदास के मार्ग पर हमेशा चलने की भरपूर कोशिश किया करते थे. प्रोफेसर आचार्य परशुराम चतुर्वेदी पर अपने विचार व्यक्त करते हुए सिद्धांत दर्शन के प्रोफेसर चंद्रशेखर पांडे ने कहा कि संतों ने संचार माध्यम का प्रयोग ज्ञान के प्रसार के लिए किया. स्वागत पत्रकारिता विभाग अध्यक्ष प्रोफेसर ज्ञान प्रकाश मिश्रा ने किया, कार्यक्रम का संचालन डॉक्टर अशोक कुमार ज्योति व धन्यवाद ज्ञापन डॉक्टर बाला लखेन्द्र द्वारा किया गया. इस अवसर पर डॉक्टर प्रीति त्रिपाठी, डा. धीरेंद्र राय, चंद्रशेखर मिश्र, डा. श्वेतांक मिश्र, आशुतोष त्रिपाठी, डा. मुकेश शुक्ल, अंकित पांडेय, सोनल, गीतांजलि, निधि शाह आदि ने आचार्य परशुराम चतुर्वेदी पर अपने विचार व्यक्त किए