
भारत अध्ययन केंद्र, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी और आनंद मार्ग प्रचारक संघ की बौद्धिक शाखा, रेनेसां यूनिवर्सल के संयुक्त तत्वावधान में 17 जुलाई को ‘भारतीय दर्शन में श्री श्री आनंदमूर्तिजी के योगदान’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. शरदिंदु कुमार तिवारी, समन्वयक, भारत अध्ययन केंद्र के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने सभी अतिथियों और छात्रों का स्वागत करते हुए श्री श्री आनंदमूर्ति जी के जीवन और मानवीय जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके अवदानों की चर्चा की।
डॉ. सूर्यकांत त्रिपाठी, संस्कृत विभाग, पंडित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर ने श्री श्री आनंदमूर्ति जी के दार्शनिक और आध्यात्मिक अवदानों की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने श्री श्री आनंदमूर्ति जी के अवदानों को मानवीय समाज के भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत सामयिक और उपयोगी बताया।
प्राउटिस्ट यूनिवर्सल के अंतर्राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य राजेश सिंह ने श्री श्री आनंदमूर्ति जी द्वारा वर्ष 1959 में प्रतिपादित सामाजिक आर्थिक दर्शन प्रगतिशील उपयोग तत्त्व (प्रउत) की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने प्रउत दर्शन को समय की मांग बताया और जोर देकर कहा की सिर्फ प्रउत दर्शन ही पूरे विश्व को पूंजीवादी शोषण से बचा सकता है। साथ ही, दुनिया भर में चल रहे युद्ध की विभीषिकाओं ने संयुक्त राष्ट्र संघ की विफलता को बुरी तरह उजागर कर दिया है। ऐसे में प्रउत दर्शन आधारित विश्व सरकार की स्थापना ही संपूर्ण विश्व के शान्ति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता आनंद मार्ग प्रचारक संघ के केंद्रीय आर.यू. सचिव, आचार्य दिव्यचेतनानंद अवधूत ने श्री श्री आनंदमूर्ति जी के पुस्तक ‘आनंद सूत्रम्’ और ‘आइडिया एंड आइडियोलॉजी’ पर अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने ‘ब्रह्म’ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि शिव और शक्ति का संयोजन ही ब्रह्म है। ब्रह्म का अर्थ है ‘महान’-वह सत्ता जो स्वयं महान है और अन्य सभी सत्ताओं को महान बनाती है। शिव और शक्ति की पूर्णता ‘संचर’ और ‘प्रतिसंचर’ की प्रक्रिया में निहित है। यहाँ संचर का अर्थ है केंद्रत्यागी गति’ (Centrifugal movement) और प्रतिसंचर का अर्थ है ‘केंद्रोन्मुखी गति’ (Centripetal movement)। संचर का अर्थ सूक्ष्म से स्थूल या ‘एक से अनेक’ की ओर बढ़ना है, जबकि प्रतिसंचर का अर्थ स्थूल से सूक्ष्म की ओर लौटना है।
आचार्य जी ने ‘आनंद’ के अर्थ की भी व्याख्या की। उन्होंने कहा कि असीम सुख ही ‘आनंद’ (Bliss) है और यही असीम आनंद है। श्री श्री आनंदमूर्ति जी के अनुसार आनंद और ब्रह्म एक ही हैं। उपनिषद में भी कहा गया है कि यदि कोई उस आनंद (ब्रह्म) को जान लेता है, तो वह कभी भयभीत नहीं होता। मनुष्य तब निर्भय हो जाता है जब वह यह अनुभव कर लेता है कि ब्रह्म ही आनंद है।
आचार्य जी ने श्री श्री आनंदमूर्ति जी द्वारा 1982 में प्रतिपादित नव्यमानवतावाद दर्शन की भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि पारंपरिक मानवतावाद ने सिर्फ मनुष्य को केंद्र में रखा, लेकिन नव्यमानवतावाद का मानना है कि ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुओं का भी उतना ही महत्व है। श्री श्री आनंदमूर्ति जी के अनुसार, जब मनुष्य का प्रेम संकीर्ण दायरों से उठकर पूरी सृष्टि के लिए एक समान हो जाता है, वही सच्चा नव्यमानवतावाद है। यह दर्शन समाज में मौजूद विभिन्न प्रकार के ‘वादों’ को मानवता के लिए खतरनाक बताया। यह दर्शन सभी तरह के संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर सभी को विश्व प्रेम और वसुधैव कुटुम्बकम् की ओर ले चलता है। श्री श्री आनंदमूर्ति जी कहते हैं; “ओ मनुष्य, तुम्हारा शारीरिक उत्थान हो, मानसिक रूप से विकसित हो और आध्यात्मिक आनंद में बहते रहो, यही नव्यमानवतावाद है।”
डॉ अमित पांडे ने कार्यक्रम का संचालन किया। दर्शन शास्त्र और संस्कृत विभाग के शोधार्थी बड़ी संख्या में इस सेमिनार में उपस्थित थे।
