
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी बहुदलीय व्यवस्था, वैचारिक विविधता और जनता के जनादेश का सम्मान है। लोकतंत्र में राजनीतिक दल जनता के विश्वास का प्रतिनिधित्व करते हैं और चुनावों के माध्यम से जनता तय करती है कि सत्ता किसके हाथ में होगी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार विपक्षी दलों को तोड़ने, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को अपने पक्ष में करने और सरकारों को अस्थिर करने की घटनाएँ सामने आई हैं, उसने लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
जब जनता किसी दल को वोट देती है, तो वह केवल व्यक्ति को नहीं बल्कि उसकी विचारधारा, नीतियों और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को भी समर्थन देती है। ऐसे में यदि निर्वाचित प्रतिनिधियों को विभिन्न तरीकों से दल बदलने के लिए प्रेरित किया जाता है और उनके माध्यम से सरकारें बनाई या गिराई जाती हैं, तो यह सीधे-सीधे जनता के जनादेश का अपमान है। लोकतंत्र में सत्ता का परिवर्तन जनता के मत से होना चाहिए, न कि राजनीतिक जोड़-तोड़ से।
आज देश में यह धारणा मजबूत हुई है कि विपक्षी नेताओं के विरुद्ध जांच एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। कई मामलों में देखा गया है कि जो नेता सत्ता पक्ष की आलोचना करते हैं, उनके खिलाफ ईडी, सीबीआई या आयकर विभाग की कार्रवाई होती है, लेकिन वही नेता यदि सत्ताधारी दल में शामिल हो जाएँ तो उनके विरुद्ध कार्रवाई की गति धीमी पड़ जाती है या समाप्त हो जाती है। इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
विपक्ष लोकतंत्र का दुश्मन नहीं बल्कि उसका अनिवार्य स्तंभ होता है। एक मजबूत विपक्ष सरकार को जवाबदेह बनाता है, जनता के मुद्दों को उठाता है और नीतिगत बहस को जीवित रखता है। यदि विपक्ष को राजनीतिक रूप से पराजित करने के बजाय उसे तोड़ने का प्रयास किया जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा ही कमजोर होती है। इससे स्वस्थ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा समाप्त होती है और लोकतंत्र केवल सत्ता के केंद्रीकरण का माध्यम बनकर रह जाता है।
पार्टियों को तोड़ने की राजनीति राज्यों में अस्थिरता भी पैदा करती है। जब निर्वाचित सरकारों को गिराने या बहुमत के समीकरण बदलने की कोशिशें होती हैं, तब विकास कार्य प्रभावित होते हैं और जनता के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएँ, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर ध्यान देने के बजाय राजनीतिक ऊर्जा सत्ता बचाने और सत्ता हथियाने में खर्च होने लगती है।
लोकतंत्र की सुंदरता विचारधाराओं के संघर्ष में है, न कि राजनीतिक दलों को कमजोर करने में। यदि किसी दल की नीतियाँ गलत हैं तो उसे चुनावी मैदान में पराजित किया जाना चाहिए। लेकिन यदि सत्ता प्राप्ति का रास्ता विपक्षी दलों को तोड़ना बन जाए, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण का संकेत है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल जनादेश का सम्मान करें, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता बनाए रखें और जनता के मुद्दों पर राजनीति करें। भारत का लोकतंत्र दुनिया के लिए एक उदाहरण रहा है। इसे मजबूत बनाने की जिम्मेदारी सभी राजनीतिक दलों की है। सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन लोकतांत्रिक परंपराएँ और संवैधानिक मूल्य स्थायी होते हैं। इन्हें कमजोर करना किसी भी सरकार के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।
लोकतंत्र की रक्षा तभी संभव है जब जनता के जनादेश, विपक्ष की भूमिका और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाए।
— वैभव कुमार त्रिपाठी डबलू
प्रवक्ता, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, नई दिल्ली