
भारत का लोकतंत्र दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जाना जाता है। यह लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि विपक्ष के सम्मान, संस्थाओं की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और संविधान के मूल्यों की रक्षा का नाम है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में देश में जो राजनीतिक वातावरण बना है, उसने इन मूल्यों को गंभीर चुनौती दी है।
आज यह प्रश्न देश का आम नागरिक पूछ रहा है कि क्या विपक्षी दलों के सांसदों और विधायकों को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल करवाना लोकतंत्र है? क्या जनता द्वारा चुनी गई सरकारों को गिराने के लिए राजनीतिक खरीद-फरोख्त करना लोकतंत्र है? क्या विपक्षी नेताओं पर ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग की कार्रवाई का दबाव बनाकर उन्हें भाजपा में शामिल होने के लिए मजबूर करना लोकतंत्र है?
देश ने देखा है कि जिन नेताओं पर भाजपा में शामिल होने से पहले भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, वही नेता भाजपा में आते ही “ईमानदार” घोषित कर दिए जाते हैं। इससे यह संदेह स्वाभाविक रूप से पैदा होता है कि जांच एजेंसियों का उपयोग न्याय के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।
लोकतंत्र में विपक्ष सरकार का दुश्मन नहीं होता बल्कि जनता की आवाज़ होता है। लेकिन आज विपक्ष की आवाज़ को दबाने, संसद में चर्चा से बचने और असहमति को देशद्रोह या राष्ट्रविरोध से जोड़ने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। संसद में महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस कम और सत्ता के पक्ष में प्रचार अधिक दिखाई देता है। यह लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा नहीं है।
देश की जनता यह भी देख रही है कि महंगाई लगातार आम परिवारों की कमर तोड़ रही है। बेरोजगारी ने युवाओं के सपनों को संकट में डाल दिया है। किसान अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े प्रश्न लगातार उठ रहे हैं। लेकिन इन वास्तविक समस्याओं पर जवाब देने के बजाय सत्ता विपक्ष पर कार्रवाई और राजनीतिक प्रबंधन में अधिक रुचि लेती दिखाई देती है।
आज कई क्षेत्रीय दलों के नेताओं को तोड़कर उनकी पार्टियों को कमजोर करने की कोशिशें हुई हैं। जनता जिस विचारधारा और कार्यक्रम के आधार पर प्रतिनिधियों को चुनती है, यदि वही प्रतिनिधि दबाव, प्रलोभन या सत्ता के प्रभाव में अपनी राजनीतिक निष्ठा बदल दें तो यह मतदाता के जनादेश का अपमान है। लोकतंत्र में दल बदल की राजनीति और चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने की संस्कृति लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है।
नरेंद्र मोदी जी की कार्यशैली पर इसलिए प्रश्न उठते हैं क्योंकि लोकतंत्र का मूल भाव संवाद और सहमति है, जबकि वर्तमान राजनीति में निर्णयों का अत्यधिक केंद्रीकरण दिखाई देता है। जब संस्थाएं स्वतंत्र न दिखें, विपक्ष को शत्रु की तरह देखा जाए, मीडिया का बड़ा हिस्सा सवाल पूछने के बजाय सत्ता का गुणगान करने लगे और जांच एजेंसियों के निष्पक्ष होने पर प्रश्न उठने लगें, तब लोकतंत्र की सेहत को लेकर चिंता होना स्वाभाविक है।
एक लोकतांत्रिक नेता आलोचना को स्वीकार करता है, असहमति का सम्मान करता है और संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने देता है। लेकिन जब राजनीतिक विरोधियों को समाप्त करने की रणनीति, भय का वातावरण और सत्ता के केंद्रीकरण की प्रवृत्ति बढ़ती है, तब लोग उसे लोकतांत्रिक नेतृत्व नहीं बल्कि तानाशाही प्रवृत्ति के रूप में देखने लगते हैं।
भारत का संविधान किसी एक व्यक्ति, एक दल या एक विचारधारा का नहीं है। यह देश के 140 करोड़ नागरिकों की साझी विरासत है। लोकतंत्र की रक्षा केवल विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं बल्कि हर जागरूक नागरिक का कर्तव्य है। आज आवश्यकता है कि हम संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर खड़े हों।
देश को मजबूत लोकतंत्र चाहिए, मजबूत संस्थाएं चाहिए और जनता के प्रति जवाबदेह सरकार चाहिए। सत्ता का अहंकार और लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण किसी भी राष्ट्र के लिए शुभ संकेत नहीं होता। भारत की जनता सब देख रही है और लोकतंत्र में अंतिम निर्णय हमेशा जनता ही करती है।
“लोकतंत्र में विपक्ष को खत्म करने की कोशिश सत्ता को मजबूत नहीं बनाती, बल्कि लोकतंत्र को कमजोर करती है।”
लेखक
वैभव कुमार त्रिपाठी डबलू
राष्ट्रीय प्रवक्ता अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी