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महाभारत भारतीय ज्ञान परंपरा का अक्षय भंडार : प्रो. शरदिंदु कुमार तिवारी

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पद्म विभूषण प्रो. डी.पी. चट्टोपाध्याय स्मृति व्याख्यान में महाभारत के दार्शनिक, साहित्यिक, सामाजिक और लोकजीवन संबंधी आयामों पर हुआ विमर्श

वाराणसी। भारत अध्ययन केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आयोजित पद्म विभूषण प्रो. डी.पी. चट्टोपाध्याय स्मृति व्याख्यान में ‘महाभारत : भारतीय ज्ञान परंपरा के विशेष संदर्भ में’ विषय पर व्याख्यान देते हुए प्रो. शरदिंदु कुमार तिवारी, समन्वयक, भारत अध्ययन केन्द्र ने कहा कि महाभारत भारतीय ज्ञान परंपरा का ऐसा अक्षय भंडार है, जिसमें जीवन, समाज, राजनीति, दर्शन, साहित्य, नैतिकता और लोकसंस्कृति के विविध आयाम समाहित हैं। महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दृष्टि और सांस्कृतिक चेतना का व्यापक ग्रंथ है।

उन्होंने महाभारत की प्रसिद्ध उक्ति ‘यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्’ का उल्लेख करते हुए कहा कि महाभारत की व्यापकता और विषयवस्तु को देखते हुए यह उक्ति केवल रचनाकार की दर्पोक्ति नहीं, बल्कि इसमें गहरी सच्चाई भी निहित है। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के माध्यम से वेदों के ज्ञान और दर्शन को व्यापक समाज तक पहुँचाने का प्रयास किया। इसी कारण महाभारत को पंचम वेद की संज्ञा भी प्राप्त हुई।

प्रो. तिवारी ने कहा कि भारतीय साहित्य की अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाओं का स्रोत महाभारत रहा है। कालिदास के ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ की कथावस्तु शकुंतलोपाख्यान से तथा श्रीहर्ष के ‘नैषधीयचरितम्’ की कथावस्तु नलोपाख्यान से संबद्ध है। इससे स्पष्ट होता है कि महाभारत भारतीय साहित्यिक परंपरा का महत्त्वपूर्ण आधार रहा है।

भगवद्गीता की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि गीता महाभारत के भीष्मपर्व का हिस्सा है और यह किसी एक जाति, धर्म अथवा संप्रदाय तक सीमित ग्रंथ नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए जीवन-दर्शन प्रस्तुत करती है। इसमें कर्म, ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय है। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ जैसे उपदेश मनुष्य को कर्मनिष्ठा और अनासक्ति का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने युद्धभूमि में गीता के उपदेश की कालगत जटिलता को समझाने के लिए स्वप्न और सूक्ष्म काल का उदाहरण भी प्रस्तुत किया।

धर्म की अवधारणा स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति अथवा संप्रदाय नहीं, बल्कि वह आचरण है जिसे मनुष्य अपने जीवन में धारण कर सके। महाभारत की उक्ति ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्’ को धर्म का व्यावहारिक सार बताते हुए उन्होंने कहा कि जो व्यवहार हमें स्वयं के लिए अच्छा नहीं लगता, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ भी नहीं करना चाहिए। यह सिद्धांत सामाजिक सद्भाव और मानवीय नैतिकता का आधार है।

उन्होंने ‘छात्राणामध्ययनं तपः’ का उल्लेख करते हुए कहा कि विद्यार्थियों के लिए अध्ययन ही तपस्या है। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि अनुशासन, एकाग्रता और व्यक्तित्व का विकास करना भी है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पुरुषार्थ चतुष्टय की व्याख्या करते हुए उन्होंने इनके संतुलित और मर्यादित उपभोग पर बल दिया।

ईशावास्य उपनिषद के ‘ईशावास्यमिदं सर्वं’ तथा ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’ मंत्रों की व्याख्या करते हुए प्रो. तिवारी ने त्यागपूर्वक भोग की भारतीय अवधारणा को स्पष्ट किया। उन्होंने रेलयात्रा में उपलब्ध चादर, कंबल और तकिए का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार यात्री यात्रा पूरी होने पर इन वस्तुओं को वहीं छोड़ देता है, उसी प्रकार मनुष्य को संसार की वस्तुओं का उपयोग तो करना चाहिए, लेकिन उनमें स्थायी स्वामित्व और अनावश्यक आसक्ति का भाव नहीं रखना चाहिए।

महाभारत के राजधर्म और राजनीति संबंधी पक्षों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि राजा का दायित्व केवल शासन करना नहीं, बल्कि प्रजा का पालन-पोषण, संरक्षण और कल्याण सुनिश्चित करना भी है। जिस प्रकार गर्भवती स्त्री अपने गर्भस्थ शिशु की प्रत्येक गतिविधि के प्रति सजग रहती है, उसी प्रकार शासक को भी अपनी प्रजा की आवश्यकताओं और कठिनाइयों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। उन्होंने महाभारत को घर में रखने से पारिवारिक कलह होने की धारणा को निराधार बताते हुए लोगों से इस महान ग्रंथ का अध्ययन करने का आग्रह किया।

भारतीय ज्ञान परंपरा के लोकव्यापी स्वरूप की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में ज्ञान केवल शास्त्रों और ग्रंथों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोकभाषाओं, लोककथाओं, कहावतों और मौखिक परंपराओं के माध्यम से सामान्य जन तक पहुँचा है। घाघ कवि का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि ज्योतिष और कृषि संबंधी ज्ञान को लोकभाषा में प्रस्तुत करके किसानों और सामान्य लोगों तक पहुँचाया गया। दादी-नानी से सुनी जाने वाली अनेक कथाएँ भी इसी परंपरा की वाहक हैं।

उन्होंने आदिवासी एवं जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का उल्लेख करते हुए कहा कि वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों, औषधियों और पर्यावरण के संबंध में इन समुदायों के पास पीढ़ियों से संचित व्यावहारिक ज्ञान है। भारतीय ज्ञान परंपरा को समग्रता में समझने के लिए शास्त्रीय, लोक और जनजातीय ज्ञान परंपराओं का अध्ययन एवं संरक्षण आवश्यक है।

प्रो. तिवारी ने कहा कि परंपरा किसी एक दिन में निर्मित नहीं होती, बल्कि अनेक पीढ़ियों, अनुभवों, विचारों और ज्ञान-स्रोतों की निरंतर श्रृंखला से विकसित होती है। भारतीय ज्ञान परंपरा का उद्देश्य व्यक्ति को केवल विद्वान बनाना नहीं, बल्कि उसे नैतिक, विवेकशील, संवेदनशील और आदर्श नागरिक बनाना है।

कार्यक्रम में डॉ राजेश सरकार, डॉ फिरोज, डॉ सुनील नारायण उपाध्याय, डॉ ज्ञानेंद्र नारायण राय, गीता भट्ट, जया पाण्डेय तथा बड़ी संख्या में अनेक संकायों के छात्र एवं शोध छात्र उपस्थित थे।अपने व्याख्यान के समापन में उन्होंने श्रोताओं से महाभारत का अध्ययन करने तथा उसमें निहित जीवनोपयोगी मूल्यों को अपने आचरण में उतारने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि ज्ञान की सार्थकता तभी है जब वह व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के जीवन को बेहतर बनाने में सहायक हो। कार्यक्रम का संचालन तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. डॉ. अमित कुमार पाण्डेय ने किया।

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