
अंग्रेजों द्वारा अप्रैल फूल डे के माध्यम से हिंदू नव वर्ष के महत्व को कम करने के प्रयास के विरोध में काशी के विद्वानों ने हास्य व्यंग्य के माध्यम से यह मंच तैयार किया था I जिसे आजादी के बाद साहित्यिक पुरोधाओं स्वर्गीय चकाचक बनारसी, स्वर्गीय धर्मशील चतुर्वेदी एवं श्री सांड़ बनारसी ने इस परंपरा को आगे बढ़ायाI
कार्यक्रम का शुभारंभ गर्दभ हुंकार एवं विलुप्त होती लोक नृत्य प्रस्तुति के साथ हुआ I
काशी के कलाकार एवं उद्यमी उमेश जोगाई को दुल्हन का रोल दिया गया था और उनकी पत्नी को दूल्हा का रोल दिया गया था ज दोनों की पंडित द्वारा शादी एवं तत्पश्चात काज़ी द्वारा निकाह भी पढ़ाया गयाI शादी एवं निकाह के संपन्न होने के तुरंत बाद पत्नी जो पति बनी थी उन्होंने कहा कि मैं इस शादी को नहीं मानता क्योंकि दुल्हन के मूंछ थी I

आमंत्रित कवि गणों में सरदार प्रताप फौजदार, अकबर ताज, विकास बौखल, कामता माखन, जगजीवन मिश्रा ,धर्मराज उपाध्याय सलीम शिवाल्वी, प्रशांत सिंह, प्रशांत बजरंगी, इत्यादि थे I बनारस के कवि दमदार बनारसी द्वारा किया गया
कार्यक्रम में विशिष्ट जनों की उपस्थिति- जिला न्यायाधीश, पुलिस आयुक्त, विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, सचिव, वाराणसी के महापौर अशोक तिवारी, विधायक नीलकंठ तिवारी, एमएलसी बृजेश सिंह, एचडीएफसी बैंक के जोनल हेड मनीष टंडन, क्लस्टर हेड रोहित खन्ना एवं काशी की तमाम सम्मानित जनता उपस्थित थी Iअतिथियों का सम्मान शनिवार गोष्ठी के उपाध्यक्ष डॉ रमेश दत्त पांडे एवं श्री विवेक सिंह द्वारा किया गया i संचालन,आयोजन एवं कार्यक्रम में भाग लेने वाले कवियों -कलाकारों का सम्मान दमदार बनारसी ने दमदार अंदाज में किया